पिछले अंक में मैंने यात्रा की तैयारियों का ज़िक्र किया था। अब उसके आगे बढ़ते हैं। 3 सितंबर 2025 ************* आखिर वो दिन आ ही गया जब कि मैं अपने जीवन की पहली विदेश यात्रा के लिए पूरी तरह तैयार था बशर्ते कि नेपाल यात्रा को विदेश यात्रा न माना जाए क्योंकि नेपाल मैं दो तीन बार जा चुका हूँ। रात में मुझे विदा करने और मेरी तैयारियों को अंतिम रूप प्रदान करने के लिए मिन्नी और राहुल आ गए थे।उन लोगों ने अपने अनुभव के आधार पर कुछ हिदायतें मुझे दीं जिसे मैंने गाँठ बाँध लिया। चूँकि सुबह समय की कमी थी इसलिए मस्तो ने बाटी रात को ही बना लिया था जिसको सुबह पैक किया जाना था।सबसे बड़ी बात ये थी कि बनारस से जाने वालों में डॉक्टर माथुर के अलावा ये सबकी ही पहली विदेश यात्रा थी और इसलिए हमारी उत्सुकता, शंकाएँ, मानसिक अवस्था एक जैसी ही थीं। डॉक्टर माथुर इस मामले में बहुत अनुभवी थे और ये उनकी पैंतालीसवीं विदेश यात्रा थी। उन्होंने कहा कि वो हमसे लाल बहादुर शास्त्री अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर सुबह मिलेंगे। मेरा कार्यक्रम ये था कि चंद्र प्रकाश सुबह चार बजे मेरे यहाँ अपने ड्राइवर के साथ आयेंगे और मुझे लेते हुए मलदहिया से शुभम को लेते हुए एयर पोर्ट पहुँचेंगे। हालाँकि सुबह चार बजे निकलना था और सोने के लिए मेरे पास पर्याप्त समय था लेकिन उत्कंठा के मारे नींद कोसों दूर थी। बार-बार ये लगता कि कहीं कुछ भूल तो नहीं रहा हूँ। सोचते-सोचते कब नींद ने मुझे अपने आगोश में ले लिया पता ही नहीं चला। लेकिन इसके पहले कि अलार्म बजे नींद खुल गई। वैसे ये मेरे साथ हमेशा ही होता है कि अलार्म बजने के पहले नींद खुल ही जाती है।रात में कई बार चिहुंक कर उठ जाता हूँ कि कहीं ऐसा तो नहीं कि अलार्म बजा ही नहीं और मैं सोया ही रह गया। खैर, उठा तो पहले चंद्र प्रकाश को फोन किया, उसने तुरंत फ़ोन उठा लिया और कहा कि वो पहले ही उठ चुका है। बड़ी सांत्वना मिली कि चलो आख़िरी टाइम में भागम-भाग नहीं होगी। फ्रेश हुआ, ब्रश किया और कॉफ़ी चढ़ा दी।मस्तो को भी चिंता थी तो वो भी उठ कर खाना वाना पैक करने में मेरी मदद करने लगीं। कॉफ़ी पी कर मैंने एक बार पुनः शंका निवारण का प्रयास किया ताकि रास्ते में इसकी ज़रूरत न पड़े। ये मेरी कमजोरियों में से एक सबसे बड़ी कमजोरी है कि सार्वजनिक स्थलों पर मेरे लिए लघु शंका करना तक कठिन हो जाता है, मैं इसके लिए भी बंद वाश रूम का ही प्रयोग करता हूँ। चंद्र प्रकाश सही समय पर आ गए। कुछ खाने का सामान वो मेरे ही घर छोड़ गए थे उसे भी व्यवस्थित किया गया और मैं निकल पड़ा अपनी पहली विदेश यात्रा पर। रास्ते में शुभम को लेना था। वो पहले ही आ कर सामान के साथ सड़क पर खड़ा था। हमने फटाफट उसका सामान लादा और “नमः पार्वती पतये हर हर महादेव का उद्घोष किया और एयरपोर्ट के लिए निकल गए। सुबह होने को थी और दूर आसमान में पौ फटने लगी थी रात की स्याह चादर को कोई आहिस्ता-आहिस्ता खींच रहा था। हम शहर के बाहरी इलाके से गुज़र रहे थे तो सड़कें सूनी और चौड़ी लग रहीं थीं। ये वही सड़कें थीं जिन पर दिन में चलना मुहाल होता है। संत अतुलानंद वाले तिराहे से बाबतपुर की ओर जाने वाले रास्ते पर तो लगता ही नहीं है कि हम बनारस में हैं। कई दफ़े विश्वास ही नहीं होता कि ये वही बनारस है। सड़क के बीच में पूरी लंबान में नारियल और खजूर के पेंडों की लंबी क़तार चली गई है और हमे केरल में होने का भ्रम होने लगता है। हम समय से कुछ पहले ही एयरपोर्ट पहुँच गए। डिजी यात्रा वाले प्रवेश द्वार से हम लोग भीतर गए।सुबह बिल्कुल भी भीड़ नहीं थी, थोड़ी देर में ही हमारा लगेज चेक इन में चला गया। सामान जमा करते-करते सिक्योरिटी भी शुरू हो गई। हम लोगों के साथ कैमरा, चार्जर, स्मार्ट वॉच, पॉवर बैंक, मोबाइल जैसे उपकरण थे जिनको अलग-अलग निकाल कर ट्रे में रखना और स्कैन के बाद सबको वापस बैग में सेट करना एक बड़ा काम था। मैंने सारा सामान निकाल लिया लेकिन अपना मोबाइल ट्रे में ही भूल गया वो तो चंद्र प्रकाश की निगाह पड़ गयी वरना जो कहते हैं न कि “धरते झाँपी बवंडर” वाली कहावत चरितार्थ हो गयी होती। सिक्योरिटी से निपट कर हम ऊपर अपने निर्दिष्ट गेट पर जाकर बैठ गए। ऊपर से ही हमने देखा कि डॉक्टर माथुर चेक इन कर सिक्योरिटी चेक के लिये जा रहे थे। थोड़ी देर में वो भी आ गए। ये सब करते-करते रात विदा हो चुकी थी। बाहर शीशे के पार भोर की दस्तक के बीच जहाज़ आते जाते दिखाई पड़ने लगे थे। थोड़ी देर में हमारा जहाज़ भी हैंगर से आ लगा। इसके बाद बोर्डिंग की घोषणा हुई। मुझे शुभम के बगल वाली सीट मिली। सात बजकर पच्चीस मिनट पर हमारा एयर इंडिया एक्सप्रेस का जहाज़ आसमान में उड़ गया।आठ बजकर तीस मिनट पर हमारा विमान इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर उतर गया। अपना सामान प्राप्त करके हम लोग अन्तरराष्ट्रीय उड़ान वाले हिस्से की और बढ़े, वहाँ प्रवेश के पहले हमारा पासपोर्ट और वीज़ा चेक किया गया। चेक इन के लिए हम सब लाइन में लग गए। चूँकि हमारा टिकट एक ही पी एन आर पर था तो हम सब एक ही काउंटर पर पहुँच गए। इसी बीच डॉक्टर माथुर दूसरी लाइन से अलग काउंटर पर चले गए। विजेंद्र जी और चेतना जी चेक इन करा चुके थे। घनश्याम जी और संजय जी भी दूसरे काउंटर्स से चेक इन करा चुके थे। हमारे काउंटर वाली लड़की ने पूछा कि क्या ये हमारी पहली विदेश यात्रा है? हमारे हाँ कहने पर उसने एक डिमांड रख दी कि वियतनाम में हमारे होटल स्टे की कन्फर्म बुकिंग की पी डी एफ़ दिखाइए। अब ये नई समस्या आन खड़ी हुई थी। मैंने डॉक्टर साहब से पूछा तो वो बोले कि उनसे तो ऐसा कुछ नहीं मांगा। शायद वो लड़की हमे एहसास दिलाना चाहती थी कि विदेश यात्रा इतनी सहज नहीं होती। खैर बिन्ह से मैसेंजर पर बात हुई और थोड़ी देर में ही कन्फर्मेशन की पी डी एफ़ आ गई और हमे बोर्डिंग पास मिल गया। वहाँ से मुक्त होकर हम सिक्योरिटी चेक के लिए पहुँचे। सिक्योरिटी पर हमे किसी तरह की परेशानी नहीं हुई। लेकिन हमारी फ्लाइट के लिए जिस गेट से बोर्डिंग करनी थी वो एकदम आखिर में थी। हालांकि पैदल चलने वालों की सुविधा के लिए ट्रैवलेटर या मूविंग पेवमेंट लगे हुए हैं पर पहली बार वालों को सावधान रहने की जरूरत भी होती है। हम लोग अपने गेट के पास जा के स्थापित हुए तब याद आया कि सुबह से हम लोगों ने कुछ खाया नहीं है। चंद्र प्रकाश आलू के पराठे लाए थे और मेरे पास सत्तू वाली बाटी थी। चंद्र प्रकाश ने कागज की प्लेटों पर सबको दी। सबने खाने की तारीफ़ की, भूख लगी हो तो खाना और अच्छा लगता है वैसे पराठे और बाटी बहुत स्वादिष्ट थी। फिर संजय जैन जी ने मुझे, चेतना जी को और शुभम को कॉफ़ी और चाय पिलाई। फिर बातचीत करते करते समय हो गया जबकि बोर्डिंग के लिए हमारी पुकार हुई। हम सब लोग पुनः लाइन में लगे और अपने-अपने बोर्डिंग पास दिखा कर आगे बढ़ गए। हम सबको एकदम पीछे की सीटें मिली थीं जिसका एक फायदा ये था कि वाशरूम जाने के लिए अधिक चलना और इंतजार नहीं करना था। यही ज़ज़्बा हमे अपने जीवन में भी रखना चाहिए कि जब जैसी स्थिति हो उसमे से कुछ सकारात्मक खोज लेना चाहिए। आज पहली बार मैं अपने भारत देश की सरजमीं को लांघकर एक दूसरी दुनिया में जा रहा था जहाँ की भाषा, जहाँ की संस्कृति सब कुछ नया होगा। इस उम्र में भी मेंरी मनोदशा बिल्कुल उस बच्चे के जैसी थी जो पहली बार किसी नए स्थान के लिए जा रहा हो। सब लोग सुबह जल्दी उठे थे इसलिए उड़ान भरने के कुछ देर बाद सब सो गए। लेकिन कुछ देर बाद जब विमान का क्रू बिस्किट आदि सर्व करने लगा तो उठना पड़ा। मैंने पहले पानी माँग के पिया फिर उनका दिया शाकाहारी भोजन ग्रहण किया।शाकाहार का चाहे जितना प्रचार हो पर मांसाहारियों को हमेशा ही सुविधा रहती है। खैर, शाकाहारी भोजन भी अच्छा था। भारतीय समय के अनुसार हमने एक बजे उड़ान भरी थी और चार घंटे तीस मिनट की उड़ान के अनुसार हमे साढ़े पाँच बजे Saigon हवाई अड्डे पर पहुँचना चाहिए था लेकिन चूँकि वियतनाम का समय भारतीय समय से डेढ़ घंटे आगे है इसलिए हो ची मिन्ह के हवाई अड्डे पर लैंड करते-करते वहाँ के समय के अनुसार शाम के सात बज गए थे।यहाँ पहले हमे वियतनाम में अपनी आवक को इमीग्रेशन पर दर्ज कराना था। इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर ऐसी व्यवस्था होती ही है कि आप पहले इमीग्रेशन पास करते हैं तभी अपना सामान ले सकते हैं और एयरपोर्ट से बाहर जा सकते हैं। इमीग्रेशन के भी अनेक काउंटर थे जहाँ से हम थोड़ी देर में ही फ़ारिग़ हो गए। वहाँ से हमे अपना सामान प्राप्त करने जाना था। सामान लेकर हम बाहर निकले। एयरपोर्ट पर Loc Mai हमे लेने के लिए आए थे। Loc Mai इस यात्रा में हमारे अनुवादक भी थे और उनकी उपयोगिता खाना खाते समय सबसे अधिक होती थी क्योंकि एक वो ही थे जो हमारी बात को उनकी भाषा में समझा सकें। वहाँ से जिस होटल में हमे जाना था उसका नाम भी ‘एयरपोर्ट होटल’ था। अब यहाँ बता दूँ कि वियतनाम के लोग शाम का खाना बहुत जल्दी खा लेते हैं। इसलिए Loc Mai ने कहा कि हम लोग होटल में जल्दी हाथ मुँह धो लें और खाने के लिए नीचे आ जायें वरना खाना नहीं मिलेगा। सब लोग इतनी लंबी यात्रा के बाद काफ़ी थक गए थे इसलिए तय ये हुआ कि पहले भोजन कर लिया जाय और उसके बाद कागा स्नान करके सो जाया जाए। मेरा saily का ई सिम चालू हो गया था इसलिए मैंने अपने होटल की फोटो घर के ग्रुप में भेज दी और खाने के लिए रेस्टोरेंट चले गए। ये एक भारतीय रेस्तरां था, Indian Curry Pot. हो ची मिन्ह जिसका पुराना नाम साइगोन है और हनोई बड़े शहर हैं जहाँ भारतीय रेस्तरां मिल जाते हैं जिससे ये ज़ाहिर है कि वियतनाम भारतीय सैलानियों की पसंदीदा जगह है। एक तो यहाँ के लिए वीज़ा ऑन लाइन या ऑन अराइवल मिल जाता है दूसरे यहाँ की मुद्रा वियतनामीज़ डोंग (vnd) भी भारत की मुद्रा के मुक़ाबले कमज़ोर है। हमने खाना खाया और वापस होटल आ कर सो गए। इस तरह वियतनाम का हमारा पहला दिन समाप्त हुआ। लेकिन ये पहला दिन एक अर्थ में नहीं था क्योंकि हमारी फोटोग्राफी अगले दिन यानी कि चार सितंबर से शुरू होनी थी।